पाली/जयपुर: अक्सर जब हम ‘सरकारी स्कूल’ का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में एक पुरानी इमारत, टूटी दीवारें और उबाऊ माहौल की तस्वीर उभरती है। लेकिन राजस्थान के पाली (Pali) जिले में एक ऐसा सरकारी स्कूल है, जिसने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। यहाँ बच्चे रोते हुए नहीं, बल्कि दौड़ते हुए स्कूल आते हैं। वजह? क्योंकि उनका स्कूल, स्कूल नहीं बल्कि एक ‘ट्रेन’ (Train) जैसा दिखता है!
जी हाँ, आपने सही सुना। पाली जिले के इस स्कूल को देखकर आपको लगेगा कि आप किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं और सामने एक नीले रंग की एक्सप्रेस ट्रेन खड़ी है।
दीवारों पर ‘एजुकेशन एक्सप्रेस’, अंदर भविष्य की सवारी
पाली जिले के इस सरकारी स्कूल की इमारत को हूबहू ट्रेन के डिब्बों की तरह पेंट किया गया है।
- डिज़ाइन: क्लासरूम की बाहरी दीवारों पर ट्रेन की बोगियों जैसा नीला रंग, पीली धारियां और खिड़कियां बनाई गई हैं।
- इंजन और गार्ड रूम: स्कूल के प्रिंसिपल का ऑफिस ‘इंजन’ जैसा दिखता है और स्टाफ रूम को ‘गार्ड रूम’ का लुक दिया गया है।
- प्लेटफॉर्म: बरामदे को रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह बनाया गया है, जहाँ पिलर्स पर स्टेशनों की तरह जगह का नाम लिखा है।
दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो गांव के बीचोबीच कोई असली ट्रेन खड़ी हो। इसे ग्रामीणों ने प्यार से ‘एजुकेशन एक्सप्रेस’ (Education Express) का नाम दिया है।
बच्चों को स्कूल खींच लाने का नायाब तरीका
इस अनोखे बदलाव के पीछे स्कूल के शिक्षकों और ग्रामीणों की सोच थी। उनका मकसद था कि स्कूल का माहौल इतना दिलचस्प हो कि बच्चे खुद ब खुद पढ़ाई के लिए खिंचे चले आएं।
- बदलाव का असर: पहले जहाँ बच्चे स्कूल आने से कतराते थे, अब वे इस ‘ट्रेन वाले स्कूल’ में आने के लिए उत्साहित रहते हैं। उन्हें लगता है कि वे रोज किसी सफर पर जा रहे हैं—ज्ञान के सफर पर।
- प्राइवेट स्कूलों को टक्कर: इस स्कूल की साफ-सफाई, पेंटिंग और अनुशासन देखकर लोग कहते हैं कि यह महंगे प्राइवेट स्कूलों से भी बेहतर है। यहाँ का वातावरण बच्चों में रचनात्मकता (Creativity) भर रहा है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें
आजकल सोशल मीडिया पर इस स्कूल की तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं। लोग राजस्थान सरकार और स्थानीय भामाशाहों (दानदाताओं) की तारीफ कर रहे हैं जिन्होंने इस सोच को हकीकत में बदला।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि “बाला” (BALA – Building as Learning Aid) कॉन्सेप्ट के तहत इस तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि स्कूल की इमारत खुद बच्चों को कुछ न कुछ सिखा सके।